Yogi vs Shankaracharya Controversy: आस्था, सत्ता और सम्मान की जंग
प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार के बीच हुआ विवाद अब राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। परंपरा, आस्था और सत्ता के इस टकराव ने संत समाज को आंदोलित कर दिया है और राजनीति को नई चुनौती दे दी है।
आज की ख़बर सिर्फ़ राजनीति से जुड़ी हुई नहीं है,
बल्कि यह आस्था, सत्ता और सम्मान — तीनों के टकराव की कहानी है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आमतौर पर चर्चा होती है —
योगी बनाम अखिलेश,
सरकार बनाम विपक्ष।
लेकिन इस वक्त देशभर में जो सबसे बड़ा विवाद चर्चा में है, वह है —
👉 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बनाम शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
और यह टकराव कोई साधारण राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि धार्मिक परंपरा और प्रशासनिक सत्ता के आमने-सामने आने का मामला बन चुका है।
🔱 विवाद की शुरुआत कैसे हुई? | Prayagraj Magh Mela Incident
मामला जुड़ा है प्रयागराज माघ मेले से।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार
पालकी में सवार होकर गंगा स्नान के लिए पहुँचे।
लेकिन यहीं पर स्थिति बदल गई।
▶️ पुलिस और प्रशासन ने पालकी को आगे बढ़ने से रोक दिया।
▶️ बहस हुई।
▶️ हालात बिगड़े।
आरोप है कि:
- साधु-संतों के साथ लाठीचार्ज हुआ
- धक्का-मुक्की की गई
- जटा पकड़कर घसीटने तक के आरोप लगे
यह दृश्य केवल संत समाज ही नहीं, बल्कि आम हिंदू समाज को भी भीतर तक आहत कर गया।
🛑 धरना और अनशन | Shankaracharya Protest
घटना के बाद
शंकराचार्य ने गंगा किनारे धरना शुरू कर दिया।
❌ न अन्न ग्रहण
❌ न जल ग्रहण
मांग सिर्फ़ एक थी —
👉 सरकार सार्वजनिक रूप से माफी मांगे।
लेकिन सरकार की ओर से माफी तो नहीं आई,
उल्टा एक ऐसा कदम उठाया गया जिसने आग में घी डाल दिया।
📄 नोटिस विवाद | “प्रमाण दीजिए कि आप शंकराचार्य हैं”
प्रशासन की ओर से
शंकराचार्य को नोटिस थमा दिया गया,
जिसमें कहा गया —
“आप यह प्रमाण दीजिए कि आप वाकई शंकराचार्य हैं।”
बस…
यहीं से मामला राष्ट्रीय विवाद बन गया।
शंकराचार्य का स्पष्ट जवाब था —
“शंकराचार्य कौन है, यह न मुख्यमंत्री तय करेगा,
न राष्ट्रपति — यह परंपरा तय करती है।”
उन्होंने बेहद सख्त शब्दों में कहा —
“योगी आदित्यनाथ न संत हैं, न मठाधीश।
वह केवल एक राजनीतिक नेता हैं।”
यह बयान सीधे-सीधे सत्ता के केंद्र पर सवाल खड़ा करता है।
🚩 संत समाज में उबाल | Delhi Protest Announcement
इसके बाद देशभर के संतों में रोष फैल गया।
- अखाड़े सक्रिय हुए
- शंकराचार्यों के बीच संवाद हुआ
- और फिर बड़ा फैसला लिया गया
📍 10–11 मार्च
📍 दिल्ली – जंतर-मंतर
देशभर के चारों दिशाओं से
साधु-संत इकट्ठा होंगे।
👉 यह पहला मौका होगा
जब किसी शंकराचार्य के नेतृत्व में
बीजेपी सरकार के खिलाफ खुला धरना होगा।
⚖️ बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती
बीजेपी के सामने स्थिति बेहद मुश्किल है —
- एक तरफ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
- दूसरी तरफ: हिंदू धर्म की सर्वोच्च परंपरा — शंकराचार्य
👉 माने तो कैसे
👉 न माने तो क्या हो
🏛️ विपक्ष का हमला
विपक्ष ने मौके का पूरा फायदा उठाया।
कांग्रेस और अन्य दलों ने कहा —
“जो सरकार मुसलमानों से कागज़ मांगती थी,
आज वही सरकार संतों से कागज़ मांग रही है।”
विपक्ष का आरोप है कि यह घमंड की राजनीति है।
❓ अब सबसे बड़ा सवाल
- क्या योगी सरकार माफी मांगेगी?
- क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हस्तक्षेप करेंगे?
- क्या राजनाथ सिंह या संघ कोई बीच का रास्ता निकालेंगे?
या फिर यह विवाद
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले
बीजेपी के लिए बड़ा सिरदर्द बनेगा?
🧠 निष्कर्ष | Conclusion
यह सिर्फ़ एक घटना नहीं है।
यह सवाल है —
✔️ सत्ता की मर्यादा का
✔️ आस्था के सम्मान का
✔️ प्रशासन की संवेदनशीलता का
इतिहास गवाह है —
जब सत्ता और संत आमने-सामने आते हैं,
तो नुकसान सिर्फ़ राजनीति का नहीं,
समाज का भी होता है।
अब देखना होगा —
यह टकराव संवाद से सुलझेगा
या और गहराएगा।













